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शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

आंसू ......

 


कुछ दुख से भरे 

कुछ दर्द से भरे 

तकलीफों के साथ 

रुके रहते है एक पोर 

आंखो के कोने में 

छुपे रहते है 

बहुत तकलीफ होती है 

जब वो बहते बहते 

रुक जाते है 

और वही पर सुख जाते है 

गर कह पाती मैं दिल 

की बात तो वो भी 

आंखो से बह जाते 

कुछ दर्द तो कम हो जाते 

रो लेती जी भर के तो 

आंसू भी सुकून से 

रह पाते ।।

दुख कहा बताती है स्त्री ....


 

दुख कहा बताती है स्त्री 

खुद को कहा बाटती है स्त्री 

उसके पल्लू से पूछो

उसके आंसुओ को

कितनी बार पोछा है 

उसके तकिए से पूछो

उसके दिल का दर्द 

रात भर  रोकर भी 

हर  सुबह उठकर 

मुस्कुराती है स्त्री

 

उसकी आंखों से पूछो 

कितनी रात जाग कर काटी है 

उसको लब से पूछो 

कितनी बार कुछ कहने से 

पहले थम जाती है 

कितनी बाते दिल के अंदर 

छुपा कर रह जाती है स्त्री

 

कितनी थक चुकी है वो 

रिश्तों का भोज ढोते ढोते

जाने अंजाने में कितनी 

बार उसको झुकना पड़ा 

ना चाहकर भी 

उसको ही रुकना पड़ा 

बस रिश्तों को बचाने के 

लिए खुद झुक जाती है स्त्री

 

एक पल भी उसका 

अपना कहा है सब

वक्त तो उसने दूसरो

के नाम कर दिया 

फिर भी जवाब देना 

पड़ता है कि तुमने किया क्या

किसको कहे दुख कैसे 

बयां करे खुद के अंदर 

के तूफान को 

छुपा कर हर दर्द सीने में 

कितना कुछ सह जाती है स्त्री 

खुद से ही कितना कुछ 

छुपा जाती है स्त्री ।।

 

 

 

तेरे नाम......

 


लिख डाला तुझे अपनी 

कविताओं में 

एक एक हर्फ 

तेरे नाम कर डाला 

नज़्म बना डाला 

गीत लिख डाले 

गजलों में भी तुझे 

पीरो डाला 

फिर भी लगता है 

अकसर कही 

तुम अधूरे  रह जाते हो

बन कर मेरी अधूरी आस 

अधूरी प्यास 

तुम बिन ये जीवन 

अतृप्त रह जाता है 

जानती हूं कि 

प्रेम पाने का नाम नहीं 

प्राप्त होने का नाम है 

मैं भी तुम्हे प्राप्त करके 

कविताओं को पूर्ण कर 

लेना चाहती हूं 

बिना मिलन की 

आस लिए तुम्हे 

जी लेना चाहती हूं

अपनी कविताओं में 

कर लेना चाहती हूं 

खुद को परिपूर्ण 

अपनी कविताओं

की तरह ।।