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गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

रोज़ न जाने





रोज़ रोज़ न जाने कितनी बाते 
मैं करती हूँ तुमसे ....  
कुछ बयां हो जाते  है तो 
कुछ थम से जाते है 
ये तुम्हारा एहसास ही तो है 
जो मेरे जुबाँ तक आ जाता  है 
ये तुम्हारे जज़्बात ही तो है 
जो आँखों से छलक  जाते है 
कितनी ही बाते है जो तुम्हे बतानी है 
कितने ही एहसास है जो तुम्हे जताने है 
तेरे प्यार की गर्माहट से 
थमे  हुए शब्दों को पिघलाने है 
पिघले हुए जज्बातों को  तेरे 
सामने बहा देना है  
तेरे प्यार से खुद को  भिगो कर 
तेरे साथ में बह जाना है 



सोमवार, 11 जून 2018

ये कैसा रिश्ता है



ये कैसा रिश्ता है तेरे मेरे दरमियाँ,

जो दिखाई नहीं देता.......

सिर्फ महसूस होता है,

ये कैसा रिश्ता है तेरे-मेरे दरमियाँ,

जिसे लफ्जों में बया नहीं,

 कर सकते.....  

ये कैसा रिश्ता है,  तेरे-मेरे दरमियाँ,

जिसने बांध रखा है दोनों को,

एक बंधन में, 

जो दूर होकर भी पास....

होने का एहसास होता है,

हाँ ... ऐसा  रिश्ता है तेरे मेरे दरमियाँ...

जो है हर रिश्ते से परे,

एक विश्वास का रिश्ता,

एक प्यार का रिश्ता,

जहाँ सिर्फ एहसास है तेरे होने का,

तेरी चाहत का, तेरी मुहब्बत का....!