गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

अपनी चाय....

 

बाटी थी तुमसे जब 

अपनी चाय आधी 

बांट लिया था तब 

मैंने तुमसे अपनी 

आधी जिंदगी             

आधा गम 

आधी खुशी

आधा दर्द 

आधी हसीं 

सब कुछ बाँट लिया था 

आधा - आधा 

बांट लिया था 

तेरे आधे एहसास को 

तेरे आधे जज्बात को 

मगर पता नही था 

चले जाओगे तुम 

छोड़ कर मुझे 

आधा - अधूरा 

बिखर कर रह जाऊंगी मैं 

उस प्लेट में बिखरी चाय 

की तरह ।।

 

 

सफर दुवाओ का ....

 





कहते है जमी पर 

दुआ मांगो तो 

आसमान तक पहुंचती है 

ये सफर दुवाओ का 

दिल से निकल कर 

खुदा तक पहुंचता है 

सफर तो लंबा होता है 

मगर पूरा जरूर होता है 

मांगा है मैने भी इक दुआ

विश्वास है पूरी भी होगी 

जानती हूं की सफर लंबा है 

इंतजार की पर आशा है 

मुकम्मल जरूर होगी ।।

तुम लौट आओ ......





पिघलते मोम की तरह 

अब तुम्हारे  एहसास भी 

पिघल रहे है ,

प्यार की धागों से 

बांधा था तुम्हारी यादों को 

अब वो भी कमजोर 

पड़ रहे हैं 

वक्त बहुत बीत गया 

मन की बेचैनी को 

किससे बयां करूं 

मन का बोझ किधर 

हल्का करू 

 कोई तो हो जो 

कहे रुको ये वक्त 

है गुजर जाएगा 

ये जीवन फिर से 

सवर जायेगा 

मगर संभव नहीं 

तुम लौट आओ        

आज भी कसक 

है अभी दिल में 

तुमसे बिछड़ जाने का  

इंतजार है अभी भी

तुम्हारे आने का ।।

 

 

 

एक आंसू .....

 



एक आंसू दर्द से डूबा हुआ 

कोने में दुबका पड़ा था 
पूछा आंखो ने तुम बह क्यू
नही जाते 
आंसू बोला है तुमसे मुहब्बत 
मुझे यही रहने दो 
पड़ा हूं एक कोने में 
पड़े रहने दो 
गर बह गया तो 
जी नहीं पाऊंगा 
तुम बिन मैं रह नही पाऊंगा || 

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

तेरी यादों से .....


 



दिल में तेरी यादों की 

रोशनी से ही रोशन है 

मेरा जीवन ...।

मद्धिम मद्धिम ही सही 

मगर इसी रोशनी से ही

रोशन है जहां मेरा 

तेरी पथ पर पलके बिछाए 

विरह में जलती मैं 

बाट निहारती मेंरी 

पथराई सी आंखे 

बस तेरी ही  अनुभूतियों को 

लगाकर हृदय से 

जी रही हूं मैं तेरे इंतज़ार में 

आस का दीपक जलाए  ।।

 

कितना विचलित है मन ......

 



कितना विचलित है मन 

किसको मैं  बतलाऊ ...।

 

मैं खुद को भूल गई 

ये किसको समझाऊं

मेरी नज़रे मुझसे ही 

मेरे मन की बाते छुपाती है 

राते भीगी भीगी सी 

आंखो में ही बीत जाती है

उन भीगे-भीगे लम्हों को

किसको मैं दिखलाऊं 

कितना विचलित है मन 

किसको मैं बतलाऊं ...।

 

लड़ती रहती हूं मन से 

रूठी रहती हूं खुद से 

छुपा आंसू मुस्कुराती हूं 

सबको खुश दिखलाती हूं

दिल से कैसे मैं मुस्कुराऊं 

कितना विचलित है 

किसको मैं बतलाऊं ,....

 

कहती हूं हर पल 

सबसे समझाती हूं

सबको हर पल 

जो है ठीक है

जैसा है ठीक है 

वक्त बीत रहा है 

समय गुजर रहा हैं

खुद को कैसे समझाऊं

कितना विचलित है मन

किसको मैं बतलाऊँ  ,....

 

रिश्तों से समझौता 

ख्वाबों से समझौता 

वक्त से समझौता 

हालात से समझौता 

जीवन एक समझौता है 

या समझौता एक जीवन 

अब मैं भी ये  समझ ना पाऊं

कितना विचलित है मन 

किसको मैं बतलाऊं..... ।।

 

गूंज उठा मन संगीत से .....

 




पहना था जब 

अलंकार तेरे प्यार का 

गूंज उठा मन संगीत से 

पाकर तेरा प्यार बांध गई 

जब तुझासे 

जन्म जन्म का था ये 

रिश्ता पल दो पल

 की बात नही थी k

किया था समर्पण 

पूरे अंतर्मन से 

मन में थी व्यथा 

मिलने की चाहत 

 चुभ रहा था कांटा कोई

विरह वेदना का 

साथ चल नही सकते 

ना ही कोई आश थी 

तुझको पाने की ना ही कोई चाह थी 

आवश्यकता नहीं में तूझसे

बांध जाऊं 

मोहताज नहीं मैं की जुड 

जाऊं तेरे नाम से

तुझमें खोकर ही खो

पा लूं बस तेरी ही होकर रह जाऊं ।।